Wednesday, November 24, 2010

शायद ज़िन्दगी बदल रही है!!

जब मैं छोटा था, शायद दुनिया बहुत बड़ी हुआ करती थी..

मुझे याद है मेरे घर से "स्कूल" तक का वो रास्ता,
क्या क्या नहीं था
वहां, चाट के ठेले, जलेबी की दुकान,
बर्फ के गोले, सब कुछ,

अब वहां "मोबाइल शॉप", "विडियो पार्लर" हैं, फिर भी सब सूना है..
शायद अब दुनिया सिमट रही है...

जब मैं छोटा था, शायद शामे बहुत लम्बी हुआ करती थी.
मैं हाथ में पतंग की डोर पकडे, घंटो उडा करता था,
वो लम्बी"साइकिल रेस",
वो बचपन के खेल, वो हर शाम थक के चूर हो जाना,

अब शाम नहीं होती, दिन ढलता है और सीधे रात हो जाती है.
शायद वक्त सिमट रहा है..

जब मैं छोटा था, शायद दोस्ती बहुत गहरी हुआ करती थी,
दिन भर वो हुज़ोम बनाकर खेलना, वो दोस्तों के घर का खाना,
वो लड़कियों की बातें,

अब भी मेरे कई दोस्त हैं,पर दोस्ती जाने कहाँ है,
जब भी "ट्रेफिक सिग्नल" पे मिलते हैं "हाई" करते हैं,
और अपने अपने रास्ते चल देते हैं,

होली, दिवाली, जन्मदिन, नए साल पर बस SMS आ जाते हैं
शायद अब रिश्ते बदल रहें हैं..

जब मैं छोटा था, तब खेल भी अजीब हुआ करते थे,
छुपन छुपाई, लंगडी टांग, पोषम पा, टिप्पी टीपी टाप.
अब इन्टरनेट, ऑफिस, से फुर्सत ही नहीं मिलती..
शायद ज़िन्दगी बदल रही है.

जिंदगी का लम्हा बहुत छोटा सा है.
कल की कोई बुनियाद नहीं है
और आने वाला कल सिर्फ सपने मैं ही हैं.
तमन्नाओ से भरे इस जिंदगी मैं हम सिर्फ भाग रहे हैं

ज़िन्दगी बदल रही है,
शायद अब दुनिया सिमट रही है !!

Friday, April 23, 2010















तू दूर गागन से आई है ,
मैं धरती पर ही रहता हूँ ,
तू चाँद सितारे लायी है ,
मैं धरती पर ही सोता हूँ
न तेरा मेरा मेल कोई ,
तू ख्वाबों की परछाई है ,
मैं स्याही का हूँ दाग कोई ,
कागज़ पर छाप बनायीं है
तू बादल संग संग उड़ती है ,
मैं बारिश देखा करता हूँ ,
तुझ पर तस्वीरे बनती है ,
मैं रंग बटोरा करता हूँ
न तेरा मेरा मेल कोई ,
तू कलियों की अंगडाई है ,
मैं करवट हूँ दीवाने का ,
जिसने रातें जगवाई है
तू फूल कोई कोमल सा है ,
मैं काँटा बनकर चुभता हूँ ,
तू जन्नत के उपवन सा है ,
मैं रेगिस्तान में उगता हूँ
न तेरा मेरा मेल कोई ,
तू शीतल सी पुरवाई है ,
मैं कच्चा सा एक शायर हूँ ,
तुझ पर ही नज़्म बनायीं है
तू चाँद सी है, मैं लहर कोई ,
अपना मिलना नामुमकिन है ,
तू सूर्यमुखी, मैं रात घनी ,
कितना खुशकिस्मत वो "दिन" है















जब खताएं उनकी गुनाह हों गयी
हमारे लबों की हंसी आह हों गयी
ए बेवफा जिन्दगी ..अब् अलविदा
हमे तो .....मौत की चाह हों गयी
तब से ..जिन्दगी जहर लगती है
जब उन्हें गैरों की परवाह हों गयी
सात जन्मो के कसमें और वादे थे
कियूं इक पल में जुदा राह हों गयी
लुट गये है अब् खुशियों के काफिले
जबसे उनकी तिरछी निगाह हों गयी
सनम तुम मशहूर और आबाद रहो
बदनामिया सारी मेरी हमराह हों गयी
क्या कमी थी.भला मेरी वफाओं में
जो पूनम अमावस सी स्याह हों गयी
खुदा माना था वो बुत भी न निकले
मुहब्बत में जिन्दगी तबाह हों गयी...

Wednesday, January 27, 2010

बचपन से रहा है दिल में


वो मुझसे मुंह मोड़ कर जाएगा
भला कैसे वो छोड़ कर जाएगा
बचपन से रहा है दिल में,क्या
खुद का घर तोड़ कर जाएगा
दुआओं में असर है तो.. लौट
कर मेरे पास वो फिर आएगा

आसमान को नाप लेने दो उसे

थक कर तो जमीं पर आएगा
कियूँ फ़िक्र करूं उसके खोने की
घोंसला छोड़ कर किधर जाएगा

मेरा इश्क है मेरा दिलवर है वो

आखिर कंहा इधर उधर जाएगा
सुबह का भूला भटका मुसाफिर
शाम को लौट कर घर आएगा

मेरे नाम से ही जानेगे सब उसे

जंहा में जब भी जिधर जाएगा
मेरी याद आते ही तडप उठेगा
जब बेवफा से मन भर जाएगा

Wednesday, October 21, 2009

कुंआरीसाँसों का व्रत तोड़ दो


प्यार को प्यार से यूँ एक हसीन मोड़ दो
आज रात मेरे जिस्म में रूह अपनी छोड़ दो !
परवाह न करो,मान लो इकरार की मेरी जि़द
हर रस्म और हर कसम आज सब तोड़ दो !
फिर मिले न मिले क्या भरोसा ओ मेरे पिया
बदन में कोई निशानी मेरे आज तुम छोड़ दो !
जितने प्यासे हो तुम उतने ही प्यासे हें हम
कोरी चादर पे आज कोई सिन्दूरी रंग छोड़ दो !
तन मन और जीवन सब तुम्हारे हवाले हें अब
सोलह सावन की कुंआरीसाँसों का व्रत तोड़ दो !
दो बदन मिले यूँ दरमियाँ साँसों का फासला न हो
आगोश में छुपा लो, जिस्म दो मगर रूह जोड़ दो
झुमके- कंगन, चूड़ी पायल सबतो जेवर हें बस
अनमोल गहना तो नथ है लो इसे भी तोड़ दो
सजन तुम्हारी वासना मेरी जन्मो की है उपासना
स्वीकार कर के मुझे प्रेम की समाधि से जोड़ दो !!

Thursday, July 9, 2009

हैवान


आज हमने कफ़न को छोटा होते हुए देखा है,
आज हमने मुर्दों को भी रोते हुए देखा है !!
मेरा क्या मैं तो मर गया था उसी दिन ,
जब से मैने तुम्हे किसी और की होते हुए देखा है !!
भूल गया मैं सारे गीत ,
जब से मैने तुम्हे किसी और के साथ गुनगुनाते हुए देखा है !!
अब दिल नहीं मानता के पत्थर में भगवान रहते हैं,
हमने इंसानों को हैवान होते हुए देखा है !!

Tuesday, June 23, 2009

औरत :


नदी की धार चट्टानों पै जब आकर झरी होगी !
तभी से आदमी ने बाँध की साजिश रची होगी !!
तुझे देवी बनाया और पत्थर कर दिया तुझको !
तरेगी भी अहिल्या तो चरण रज राम की होगी !!
मरुस्थल में तुम्हारा हाल तो उस बूँद जैसा है !
जिसे गुल पी गए होंगे जो काँटों से बची होगी !!
कहीं पर निर्वसन है और निर्वासन कहीं पर है !
नहीं कुछ फर्क है, तू द्रोपदी या जानकी होगी !!
धुएँ को देखनेवालो ,ज़रा सा गौर से देखो !
यहीं पर आँच भी होगी , यहीं थोड़ी नमी होगी !!
तुम्हारी शख्सियत अंधों के हाथों मे रही हरदम !
मिठासों की कहानी है जो गूंगे ने कही होगी !!

क्या इन्सान ऐसे होते हैं


मेने मार दिया अपने अन्दर के इन्सान को
पत्थर में बसे भगवन को ...
उठा रखा हे सारे शहर का जिम्मा ,
पर नहीं पता कैसी होगी मेरी माँ...
बच्चो के लिए चाचा नेहरु बन जाता हूँ ,
मगर अपने बच्चो को कभी वक़्त नहीं दे पता हूँ ...
खबर है मुझे पूरी दुनिया की ,
कौन हे मेरा पडोसी इससे में अंजाना हूँ ...
में घूमा हूँ मंदिरों... मस्जिदों... गुरुद्वारों में ,
कौन रहता है मेरे दिल में अब तक नहीं जाना हूँ ...
गला घोट दिया मैंने अपनी भावनाओ का ,
क्या इन्सान ए़से होते हे ? ... मुझे देख अक्सर लोग यही कहते हैं !!